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आस्था

रक्षाबंधन 9 अगस्त को बहनें सुबह 5:47 से दोपहर 1:24 तक बांध सकेंगी राखी, शुभ योगों से और भी खास होगा यह पर्व

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नई दिल्ली, 08 अगस्त 2025

भाई-बहन के अटूट प्रेम और सुरक्षा के प्रतीक रक्षाबंधन का पर्व इस साल शनिवार, 9 अगस्त 2025 को पूरे देश में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह पर्व हर वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस बार रक्षाबंधन का त्योहार भद्रा काल के साये से मुक्त रहेगा, जिससे बहनें बिना किसी बाधा के रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा को निभा सकेंगी।

🔸 राखी बांधने का शुभ मुहूर्त 7 घंटे 37 मिनट तक

ज्योतिषियों के अनुसार, रक्षाबंधन के दिन राखी बांधने का शुभ समय सुबह 05:47 बजे से दोपहर 01:24 बजे तक रहेगा। यानी कुल 7 घंटे 37 मिनट तक बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांध सकती हैं। इस दौरान पूजा-पाठ और तिलक करने की सभी परंपराएं भी निभाई जा सकती हैं।

🔸 भद्रा काल समाप्त होने के बाद शुरू होगा मुहूर्त

हालांकि रक्षाबंधन से एक दिन पहले 8 अगस्त दोपहर 2:12 बजे से लेकर 9 अगस्त की रात 1:52 बजे तक भद्रा काल रहेगा, लेकिन यह शुभ मुहूर्त शुरू होने से पहले ही समाप्त हो जाएगा। इसलिए इस साल का रक्षाबंधन पूरी तरह भद्राकाल से मुक्त और शुभ रहेगा।

🔸 इस बार बन रहे हैं तीन शुभ योग:

इस बार रक्षाबंधन के दिन तीन विशेष शुभ योग भी बन रहे हैं, जो इस पर्व की पवित्रता और फल को और भी बढ़ा देंगे:

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  • सौभाग्य योग: जीवन में सौभाग्य और सुख-समृद्धि लाता है
  • शोभन योग: शुभ कार्यों के लिए उत्तम माना जाता है
  • सर्वार्थ सिद्धि योग: सभी कार्यों में सफलता देने वाला योग

ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि ऐसे दुर्लभ योगों में राखी बांधना अत्यंत फलदायी होता है।

🔸 ऐसे करें रक्षाबंधन की पूजा

पर्व की शुरुआत सुबह स्नान और ईष्ट देवता के पूजन के साथ करें। इसके बाद एक थाली में रोली, चंदन, अक्षत, दही, मिठाई और राखी रखें। एक घी का दीपक जलाएं। भाई को पूर्व या उत्तर दिशा में बैठाएं और बहनें उनके माथे पर तिलक लगाकर रक्षा सूत्र बांधें।

राखी बांधते समय तीन गांठें लगाना शुभ माना गया है:

  1. पहली गांठ – भाई की लंबी उम्र के लिए
  2. दूसरी गांठ – जीवन भर सुरक्षा का वचन लेने के लिए
  3. तीसरी गांठ – आपसी प्रेम और मधुरता के लिए

इसके बाद आरती करें, मिठाई खिलाएं और भाई बहन को उपहार भेंट करें। साथ ही माता-पिता और गुरुजनों का आशीर्वाद लेना न भूलें।

🔸 भावनाओं का पर्व है रक्षाबंधन

रक्षाबंधन सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह संवेदनाओं और रिश्तों की गहराई को दर्शाने वाला त्योहार है। यह दिन भाई और बहन के बीच प्रेम, विश्वास और सुरक्षा के बंधन को और भी मजबूत करता है।

🔍 रक्षाबंधन 2025 के मुख्य तथ्य एक नजर में:

तथ्यविवरण
तिथि9 अगस्त 2025 (शनिवार)
श्रावण पूर्णिमा आरंभ8 अगस्त, दोपहर 2:12 बजे
श्रावण पूर्णिमा समाप्त9 अगस्त, दोपहर 1:24 बजे
भद्रा काल8 अगस्त 2:12 PM से 9 अगस्त 1:52 AM
राखी बांधने का मुहूर्तसुबह 05:47 से दोपहर 01:24 तक
शुभ योगसौभाग्य योग, शोभन योग, सर्वार्थ सिद्धि योग

रक्षाबंधन 2025 में ना केवल भद्रा का प्रभाव नहीं रहेगा, बल्कि योग भी विशेष हैं। ऐसे में यह पर्व पूरे आत्मविश्वास और उल्लास से मनाने का समय है।

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आस्था

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, पूरे देश में धूमधाम से मनाया जा रहा भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव

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नई दिल्ली/वाराणसी/मथुरा
आज पूरे भारत सहित विश्वभर में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कन्हैया का जन्मोत्सव होता है।

भक्तजन व्रत रखकर पूरे दिन भक्ति में लीन रहते हैं और जैसे ही घड़ी मध्यरात्रि का समय बताती है, वैसे ही मंदिरों और घरों में “नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” के जयकारे गूंज उठते हैं।

🌼 प्रमुख आयोजन

  • मथुरा और वृंदावन– यहाँ भगवान कृष्ण के बाल्यकाल से जुड़े मंदिरों में विशेष सजावट की गई है। झांकी, रासलीला और भजन संध्याओं का आयोजन किया गया है।
  • महाराष्ट्र– यहाँ दही-हांडी की परंपरा में युवाओं की टोली पिरामिड बनाकर मटकी फोड़ने का रोमांचक कार्यक्रम करती है।
  • उत्तर भारत– घर-घर में लड्डू गोपाल को झूले में विराजमान कर भोग अर्पित किया जा रहा है।

🌟 जन्माष्टमी का महत्व

शास्त्रों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कंस के अत्याचार से मुक्त कराने और धर्म की स्थापना के लिए हुआ था। यह पर्व हमें सिखाता है कि सत्य और धर्म की सदैव विजय होती है

इस पावन अवसर पर लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएँ दे रहे हैं और भगवान श्रीकृष्ण से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना कर रहे हैं।

शुभकामना संदेश-

पूर्वांचल भारत न्यूज़ टीम की तरफ़ से “श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ।
भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से आपके जीवन में खुशियों का वास हो,
और हर दिन मधुर बाँसुरी की तान की तरह मंगलमय बने। जय श्रीकृष्ण!

#श्रीकृष्णजन्माष्टमी #जयश्रीकृष्ण #KrishnaJanmashtami #दहीहांडी #मथुरा #वृंदावन

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अपराध

बांदा में दिल दहला देने वाली वारदात: लाल बेडशीट में बंधे मिले मां और तीन बच्चों के शव

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बांदा, उत्तर प्रदेश

बांदा जिले के नरैनी कस्बे में शुक्रवार रात एक दिल दहला देने वाली घटना ने सभी को स्तब्ध कर दिया। पति से विवाद के बाद पत्नी ने तीन मासूम बच्चों को अपने साथ लाल रंग की बेडशीट में कसकर बांधा और नहर में कूद गई। पानी में उतरते ही चारों की मौत हो गई।

घटना का दृश्य देखने वालों का कलेजा कांप उठा। लाल बेडशीट में बंधे चारों शव जब बाहर निकाले गए, तो वहां मौजूद हर किसी की आंखें नम हो गईं। लोग यह सवाल करते रहे—आखिर मासूम बच्चों का क्या कसूर था?

मिली जानकारी के मुताबिक, युवक शुक्रवार रात दोस्तों के साथ शराब पार्टी कर नशे में घर लौटा। पत्नी ने रक्षाबंधन का हवाला देते हुए उसे फटकार लगाई, लेकिन बात बढ़ गई। पति के रवैये से आहत होकर महिला ने यह खौफनाक कदम उठाया।

पुलिस ने चारों शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिए हैं और मामले की जांच जारी है। गांव में मातम और सन्नाटा पसरा हुआ है।

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फोटो सोर्स- अमर उजाला

#BandaNews #Narani #SuicideCase #LalBedsheet #BreakingNews #UttarPradesh

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आस्था

खजनी के नीलकंठ महादेव मंदिर में नागराज का चमत्कार, दशकों पुराना विवाद हुआ समाप्त

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गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

गोरखपुर के खजनी तहसील के सरया तिवारी गांव में स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर में शुक्रवार को एक चमत्कारी घटना घटी, जिसने सबको हैरान कर दिया। मंदिर की 90 डिसमिल जमीन पर वर्षों से चल रहा स्वामित्व विवाद एक अद्भुत घटना के बाद अचानक सुलझ गया। यह घटना न केवल मंदिर की पवित्रता को और बढ़ा गई, बल्कि श्रद्धालुओं की आस्था को भी नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया।

विवाद का इतिहास और प्रशासनिक कार्यवाही

मंदिर की भूमि का स्वामित्व पहले देवभूमि के नाम पर दर्ज नहीं था और कुछ लोग इसे अपनी निजी संपत्ति बताकर कब्जा किए हुए थे। यह मामला प्रशासन तक पहुंचने के बाद संपूर्ण समाधान दिवस पर उठाया गया। इसके बाद राजस्व टीम ने मंदिर की भूमि की पैमाइश शुरू की। हालांकि, निर्माण कार्य के दौरान कुछ स्थानीय लोग विरोध करने लगे।

नागराज का चमत्कार

विरोध के बीच अचानक एक विशालकाय नागराज मंदिर के पास प्रकट हुए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, नागराज ने धीरे-धीरे चूने से बनी सीमा तक यात्रा की, जैसे कि भूमि की सीमा को प्रमाणित कर रहे हों। इसके बाद वे उसी रास्ते वापस लौटे और अदृश्य हो गए। यह चमत्कारी दृश्य देखकर विरोध करने वाले चुपचाप पीछे हट गए और निर्माण कार्य की अनुमति दे दी।

काल्पनिक चित्रण’

ग्रामीणों की आस्था और प्रतिक्रिया

ग्रामीणों का मानना है कि यह घटना महादेव और नागराज का संकेत थी कि मंदिर का निर्माण अब बिना रुकावट के पूरा होगा। गांव के बुजुर्गों ने इसे एक सदी का चमत्कार मानते हुए कहा कि नागराज ने साबित कर दिया कि यह भूमि महादेव की है। इस घटना के बाद मंदिर में दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी है।

नीलकंठ महादेव मंदिर का ऐतिहासिक महत्व

नीलकंठ महादेव मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है। यह मंदिर एक स्वयंभू शिवलिंग के रूप में जाना जाता है और इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि इसका शिवलिंग सैकड़ों वर्ष पुराना है। मुग़ल काल में, शासक मोहम्मद गजनबी ने इसे कीमती पत्थर समझकर ले जाने की कोशिश की थी, लेकिन वह असफल रहा।

नागराज का चमत्कार न केवल मंदिर के भूमि विवाद को समाप्त करने का कारण बना, बल्कि इसने मंदिर को एक नया रूप और श्रद्धालुओं के लिए एक तीर्थ स्थल बना दिया है।

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आस्था

धुरियापार का धवलेश्वरनाथ मंदिर: रामायण काल से जुड़ी आस्था, इतिहास और रहस्यों का संगम

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गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, 04 जुलाई 2025

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में स्थित एक छोटा सा गांव – धुरियापार – अपने भीतर इतिहास, धर्म और रहस्य की ऐसी गाथाएं समेटे हुए है, जिसे जानकर कोई भी चौंक जाएगा। यह केवल एक गांव नहीं, बल्कि साढ़े तीन हजार वर्षों की विरासत को संभाले खड़ा एक जीवित इतिहास है।

सन् 1980-81 में भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा की गई खुदाई में यह सामने आया कि यह क्षेत्र 3,500 साल से भी अधिक पुराना है। इतिहासकारों के अनुसार यह नगर छह बार उजड़ा और सातवीं बार फिर से बसाया गया। राजा धुर्य चंद द्वारा बसाए गए इस गांव का नाम भी उन्हीं के नाम पर पड़ा – धुरियापार

🕉️ धवलेश्वरनाथ मंदिर और श्रीराम की कथा

धुरियापार का सबसे प्रमुख धार्मिक स्थल है बाबा धवलेश्वरनाथ महादेव का मंदिर
यह मान्यता है कि भगवान श्रीराम जब जनकपुर से अयोध्या लौट रहे थे, तो उन्होंने यहीं शिवलिंग की स्थापना की थी। आज यह मंदिर न सिर्फ श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि इससे जुड़ी घटनाएं इसे रहस्यमय और चमत्कारी स्थल भी बनाती हैं।

इस मंदिर की एक अनोखी बात यह भी है कि जब भी भक्त जल चढ़ाते हैं, तो जल की धार हमेशा सूर्य की दिशा में गिरती है, चाहे सूर्य उत्तरायण में हों या दक्षिणायन में। यह अद्भुत दृश्य हर श्रद्धालु के मन में आस्था के साथ कौतूहल भी भर देता है।

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🧭 जब अंग्रेज भूगर्भशास्त्री को मिला खजाने का सुराग

ब्रिटिश काल के दौरान मंदिर के पास नील की कोठी नामक स्थान पर एक अंग्रेज उच्चाधिकारी का आवास था। उसका मित्र, एक भूगर्भशास्त्री, मंदिर की वास्तुकला और ऊर्जा से इतना प्रभावित हुआ कि उसने मंदिर के नीचे खजाना छिपा होने का दावा किया।

उसने मंदिर के नीचे की खुदाई करवाई और खजाने को पाने के लालच में मंदिर को विस्फोट से उड़ाने की कोशिश की
लेकिन कहते हैं —
शिवलिंग टस से मस नहीं हुआ।

बल्कि इस कृत्य में लगे मजदूर मारे गए, और पास बहती नदी खून से लाल हो गई।
उसी दिन वह भूगर्भशास्त्री पागल हो गया, और अंततः नदी में कूदकर अपनी जान दे दी।

🔮 अन्य मान्यताएं और मंदिर की मर्यादा

यह भी माना जाता है कि इस शिवलिंग पर छत्र नहीं लगाया जा सकता
मंदिर की परंपरा के अनुसार, यहां केवल वही पुजारी सेवा कर सकता है, जो धन संग्रह ना करे।
यह मंदिर भक्ति का प्रतीक है, लालच से मुक्त पवित्र स्थान।

🏰 राजा धुर्य चंद के वंशज कहां गए?

एक बड़ा सवाल यह भी उठता है —
राजा धुर्य चंद और नूर चंद के वंशज आज कहां हैं?
किस परिस्थिति में उनका अस्तित्व समाप्त हो गया, इसका कोई प्रमाण नहीं है।
यह प्रश्न आज भी धुरियापार के इतिहास में एक रहस्य बना हुआ है।

🚩 अब तीर्थस्थल बनने की उम्मीद

आज जब राम जानकी मार्ग बन रहा है, जो अयोध्या से जनकपुर तक जाएगा,
तो क्षेत्रीय जनता को उम्मीद है कि बाबा धवलेश्वरनाथ मंदिर भी इस पवित्र यात्रा का हिस्सा बनेगा।

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स्थानीय लोग चाहते हैं कि इस मंदिर को राष्ट्रीय तीर्थ स्थल के रूप में विकसित किया जाए,
जहां श्रद्धा के साथ-साथ इतिहास, परंपरा और चमत्कार की कहानी दुनिया के सामने आए।

महंत श्री रामदास दुर्वासा 50 वर्षों से अपना जीवन इस मंदिर के लिए दिए हैं साथ में अपनी पुश्तैनी जमीन को बेच कर इस मंदिर के लिए जमीन भी खरीदी है इस मंदिर पर यहां के लोगों का बहुत ही योगदान भी रहा है।

🛕 धुरियापार का बाबा धवलेश्वरनाथ मंदिर ना सिर्फ एक धार्मिक स्थल है,
बल्कि यह भारत की उस विरासत का हिस्सा है,
जहां आस्था, इतिहास और चमत्कार – तीनों एक साथ जीते हैं।

जय धवलेश्वरनाथ!
जय सियाराम!

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आस्था

नाग पंचमी पर श्रद्धा और आस्था का पर्व: सुख-समृद्धि की कामना के साथ नाग देवता को अर्पित हुआ श्रद्धा-सुमन

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गोरखपुर, 29 जुलाई 2025
सावन मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर आज पूरे देश में श्रद्धा, भक्ति और परंपरा के साथ नाग पंचमी का पर्व मनाया जा रहा है। इस पावन अवसर पर श्रद्धालुओं ने नाग देवता को दूध, पुष्प व कच्चा दूध अर्पित कर पूजा-अर्चना की। शिव मंदिरों में भजन-कीर्तन और विशेष रुद्राभिषेक का आयोजन हुआ।

शास्त्रों के अनुसार, नाग भगवान शिव के गले का आभूषण माने जाते हैं। ऐसे में इस दिन शिव की विशेष पूजा का भी महत्व है। मान्यता है कि इस दिन नाग देवता की पूजा करने से कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है और जीवन में आने वाली बाधाएं समाप्त होती हैं।

घरों में महिलाओं ने आंगन और द्वार पर सांप की आकृति बनाकर आरती उतारी और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।

इस नाग पंचमी पर शिव योग और रवि योग का विशेष संयोग भी बना, जिससे इसका महत्व और बढ़ गया है। लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं भेजकर पर्व की खुशी साझा कर रहे हैं।

“नाग देवता की कृपा से जीवन में बना रहे सुख, शांति और समृद्धि – नाग पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं।”

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आस्था

मनसा देवी मंदिर में भगदड़: करंट की अफवाह से मची अफरातफरी, 6 श्रद्धालुओं की मौत, 36 घायल

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हरिद्वार, 27 जुलाई 2025

सावन और रविवार के संयोग पर भारी भीड़ उमड़ी हरिद्वार के मनसा देवी मंदिर में, जहाँ भगदड़ में 6 श्रद्धालुओं की जान चली गई और 36 से अधिक लोग घायल हो गए। हादसे की वजह मंदिर परिसर में “करंट फैलने की अफवाह” बताई जा रही है, जिसे स्थानीय प्रशासन और चश्मदीदों ने गलत बताया है।

हादसे के वक्त क्या हुआ ?

सुबह के समय मंदिर के सीढ़ी मार्ग पर श्रद्धालुओं की भीड़ बेहद ज्यादा थी। इसी दौरान बिजली के पोल से चिंगारी निकली, जिससे लोगों में यह अफवाह फैल गई कि करंट आ गया है। अफरा-तफरी में लोग एक-दूसरे पर गिरने लगे, जिससे भगदड़ मच गई।

चश्मदीदों का बयान दिया है जिसमे स्थानीय दुकानदार अवधेश ने बताया कि करंट की कोई घटना नहीं हुई, बल्कि एक बुजुर्ग महिला के गिरने के बाद भगदड़ शुरू हुई। प्रशासन ने आने-जाने का मार्ग एक ही रखा था, जिससे रास्ता पूरी तरह भर गया और पैदल चलने तक की जगह नहीं थी।

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क्या प्रशासन की चूक है ?

भीड़ नियंत्रण में विफलता सामने आई है। सावन और रविवार को भीड़ की संभावना के बावजूद भीड़ प्रबंधन के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए। कांवड़ यात्रा के समय अपनाया गया एक-तरफा आवागमन इस बार लागू नहीं किया गया।

Image Source : PTI, मनसा देवी मंदिर में भगदड़

मुख्यमंत्री का दौरा व मुआवजा:

घटना की जानकारी मिलते ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी हरिद्वार पहुंचे। उन्होंने घायलों से मुलाकात कर स्वास्थ्य व्यवस्था की समीक्षा की और मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए।

सरकार ने मृतकों के परिजनों को ₹ 2 लाख और घायलों को ₹50,000 की सहायता राशि देने की घोषणा की है। साथ ही, पीड़ितों को उनके गृह नगर तक पहुंचाने की व्यवस्था भी सरकार करेगी।

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अखिलेश यादव ने इस घटना के बारे कहा है कि

 “हरिद्वार में मनसा देवी मंदिर में हुई भगदड़ में श्रद्धालुओं की मौत का मामला बेहद हृदयविदारक है और चिंतनीय भी।”

“भाजपा सरकार में महाकुंभ से लेकर रथयात्रा हो या अन्य कोई आयोजन सब जगह ऐसी घटनाओं का दोहराव ये बताता है कि भाजपा प्रचार तो वैश्विक स्तर का करती है लेकिन प्रबंधन स्थानीय स्तर का भी नहीं करती, इसीलिए आम श्रद्धालुओं को अपना जीवन गंवाना पड़ता है। इस मामले की भी गहन जाँच हो और श्रद्धालुओं की मृत्यु का कारण और सही आँकड़ा बताया जाए।”

निष्कर्ष: मनसा देवी मंदिर की यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना भीड़ नियंत्रण की विफलता और अफवाहों के दुष्प्रभाव की चेतावनी है। सरकार द्वारा राहत कार्य किए जा रहे हैं, लेकिन इससे भविष्य के लिए भीड़ प्रबंधन की ठोस रणनीति की आवश्यकता स्पष्ट हो गई है।

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अपराध

गोस्वामी तुलसीदास जयंती पर विशेष

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पूर्वांचल भारत न्यूज़

जीवन परिचय

गोस्वामी तुलसीदास जी हिन्दी साहित्य के महान सन्त कवि थे,
तुलसीदासजी का जन्म संवत 1589 को उत्तर प्रदेश (वर्तमान बाँदा ज़िला) के राजापुर नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। इनका विवाह दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली से हुआ था। अपनी पत्नी रत्नावली से अत्याधिक प्रेम के कारण तुलसी को रत्नावली की फटकार “लाज न आई आपको दौरे आएहु नाथ” सुननी पड़ी जिससे इनका जीवन ही परिवर्तित हो गया। पत्नी के उपदेश से तुलसी के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। इनके गुरु बाबा नरहरिदास थे, जिन्होंने इन्हें दीक्षा दी। इनका अधिकाँश जीवन चित्रकूट, काशी तथा अयोध्या में बीता।

तुलसीदास जी का बचपन बड़े कष्टों में बीता। माता-पिता दोनों चल बसे और इन्हें भीख मांगकर अपना पेट पालना पड़ा था। इसी बीच इनका परिचय राम-भक्त साधुओं से हुआ और इन्हें ज्ञानार्जन का अनुपम अवसर मिल गया। पत्नी के व्यंग्यबाणों से विरक्त होने की लोकप्रचलित कथा को कोई प्रमाण नहीं मिलता। तुलसी भ्रमण करते रहे और इस प्रकार समाज की तत्कालीन स्थिति से इनका सीधा संपर्क हुआ। इसी दीर्घकालीन अनुभव और अध्ययन का परिणाम तुलसी की अमूल्य कृतियां हैं, जो उस समय के भारतीय समाज के लिए तो उन्नायक सिद्ध हुई ही, आज भी जीवन को मर्यादित करने के लिए उतनी ही उपयोगी हैं। तुलसीदास द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या 39 बताई जाती है। इनमें रामचरित मानस, कवितावली, विनयपत्रिका, दोहावली, गीतावली, जानकीमंगल, हनुमान चालीसा, बरवै रामायण आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय है

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