उत्तर प्रदेश
पूर्वांचल विद्युत निगम में हजारों अस्थायी कर्मचारियों की नौकरी खतरे में, कर्मचारी संगठनों ने खोला मोर्चा
गोरखपुर स्थित पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम में नई ठेकेदारी व्यवस्था लागू होने से तीन हजार से अधिक अनुबंध आधारित कर्मचारियों की छंटनी हो रही है। विद्युत कर्मी संगठनों ने इस फैसले के विरुद्ध जोरदार विरोध शुरू कर दिया है और मुख्यमंत्री से दखल देने की गुहार लगाई है।
गोरखपुर। पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड में नई टेंडर प्रक्रिया के चलते बड़ी संख्या में अनुबंध पर काम कर रहे बिजली कर्मचारियों को निकाला जा रहा है। इस निर्णय से कर्मचारियों में तीव्र असंतोष फैल गया है और विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने इसके खिलाफ आवाज बुलंद की है।
नई व्यवस्था से हो रही बड़े स्तर पर छंटनी
संघर्ष समिति के प्रमुख पदाधिकारी पुष्पेंद्र सिंह, जीवेश नंदन, जितेंद्र कुमार गुप्ता, सीबी उपाध्याय, प्रभुनाथ प्रसाद, संगमलाल मौर्य, इस्माइल खान, संदीप श्रीवास्तव, करुणेश त्रिपाठी, ओम गुप्ता, राजकुमार सागर, विजय बहादुर सिंह और राकेश चौरसिया ने मीडिया को बताया कि निगम प्रशासन प्रतिदिन सैकड़ों संविदा आधारित कर्मचारियों को सेवा से हटा रहा है। इस वजह से कार्यालयों में काम का माहौल बिगड़ गया है और बचे हुए कर्मियों पर काम का दबाव कई गुना बढ़ गया है।
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एस्मा कानून लगाने पर जताया विरोध
कर्मचारी संगठनों ने अति आवश्यक सेवा अनुरक्षण कानून (एस्मा) को लागू किए जाने की भी कड़ी आलोचना की है। उनका कहना है कि बिजली विभाग में पिछले पच्चीस सालों से यह कानून चल रहा है, और अब इसे राज्य सरकार के कर्मचारियों, नगर निकाय तथा निगम कर्मियों पर भी थोपा जा रहा है। संगठनों ने इसे जनतांत्रिक मूल्यों और कर्मचारी अधिकारों पर प्रहार बताया है।
मुख्यमंत्री से की गई विशेष अपील
समिति ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से संविदा कर्मियों की सेवाएं समाप्त करने की प्रक्रिया तुरंत रोकने का आग्रह किया है। कर्मचारी नेताओं ने याद दिलाया कि मई 2017 में जारी सरकारी आदेश में शहरी इलाकों के उपकेंद्रों में 36 और गांवों में 20 कर्मचारी तैनात करने का नियम था, परंतु नए ठेके में लगभग आधे कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है।
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वर्टिकल पुनर्गठन योजना पर उठे सवाल
संघर्ष समिति ने आरोप लगाया कि वर्टिकल पुनर्संरचना योजना की असफलता के बावजूद निगम प्रबंधन इसे दूसरे शहरों में भी लागू करने पर तुला है। संगठनों का मानना है कि इसका असली मकसद बिजली वितरण को निजी फ्रेंचाइजी कंपनियों को सौंपना है, जिससे सरकारी नौकरियां खत्म होंगी और बिजली सेवाएं कमजोर पड़ेंगी।
कई जनपदों में पदों को समाप्त करने की तैयारी
समिति के अनुसार भदोही, मिर्जापुर, आजमगढ़, मऊ और फतेहपुर के अतिरिक्त अब सीतापुर, रायबरेली, उन्नाव और हरदोई जिलों में भी वर्टिकल पुनर्गठन कर पदों को खत्म करने की योजना बनाई जा रही है। कर्मचारी नेताओं का आरोप है कि पावर कॉर्पोरेशन का प्रबंधन निजीकरण की ओर बढ़ते हुए प्रदेश की विद्युत व्यवस्था को गंभीर संकट में डाल रहा है।
तीन हजार से ज्यादा कर्मचारियों को हटाया गया
संगठन द्वारा दिए गए आंकड़ों के मुताबिक वाराणसी से 417, कुशीनगर से 450, बस्ती से 453, गोरखपुर से 326, भदोही से 429, सोनभद्र से 535, प्रयागराज से 526 और कौशांबी से 569 संविदा कर्मचारियों को सेवा से मुक्त कर दिया गया है। कुल मिलाकर करीब 3705 अनुबंध कर्मियों की नौकरी जाने से उनमें तीव्र आक्रोश है और वे आंदोलन को और तेज करने की रणनीति बना रहे हैं।
380 दिनों से जारी है विरोध प्रदर्शन
पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण के विरोध में चल रहा आंदोलन 380वें दिन भी जारी रहा। सभी जिलों में बिजली कर्मचारियों ने जमकर प्रदर्शन किया और छंटनी रोकने, एस्मा कानून वापस लेने तथा निजीकरण की कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग को दोहराया।

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