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UGC नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक का अखिलेश यादव और मायावती ने किया समर्थन, फैसले को बताया न्यायोचित
UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक को लेकर अखिलेश यादव और मायावती ने प्रतिक्रिया दी है। दोनों नेताओं ने इसे न्याय, समानता और सामाजिक संतुलन से जुड़ा अहम फैसला बताया।
लखनऊ: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाए जाने के फैसले को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने शीर्ष अदालत के इस कदम का स्वागत किया है। दोनों नेताओं ने इसे न्याय और सामाजिक संतुलन से जुड़ा महत्वपूर्ण फैसला बताया।
अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपनी बात रखते हुए कहा कि सच्चा न्याय वही होता है, जिसमें किसी के साथ अन्याय या उत्पीड़न न हो। उन्होंने लिखा कि माननीय न्यायालय का दायित्व यही सुनिश्चित करना है कि कानून न सिर्फ शब्दों में, बल्कि भावना में भी स्पष्ट और न्यायपूर्ण हो।
अखिलेश यादव ने आगे कहा कि किसी भी व्यवस्था में न तो किसी का उत्पीड़न होना चाहिए और न ही किसी के साथ अन्याय, जुल्म या नाइंसाफी होनी चाहिए। उन्होंने संकेत दिया कि केवल नियम बनाना ही नहीं, बल्कि उनकी नीयत भी अहम होती है।

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मायावती ने क्या कहा
बसपा सुप्रीमो और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मौजूदा परिस्थितियों में उचित करार दिया। उन्होंने कहा कि यदि यूजीसी नए नियम लागू करने से पहले सभी संबंधित पक्षों को विश्वास में लेती और जांच समितियों समेत अन्य व्यवस्थाओं में समाज के सभी वर्गों को निष्पक्ष और तटस्थ प्रतिनिधित्व देती, तो यह स्थिति उत्पन्न नहीं होती।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के हालिया नियमों के खिलाफ दाखिल कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए इन पर रोक लगा दी है। याचिकाओं में यह दलील दी गई थी कि आयोग ने जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को गैर-समावेशी तरीके से तय किया है, जिससे कुछ वर्ग संस्थागत संरक्षण से बाहर हो सकते हैं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी किया है।
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13 जनवरी को अधिसूचित हुए थे नियम
गौरतलब है कि ये नए नियम 13 जनवरी को अधिसूचित किए गए थे। इनमें उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की जांच और समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ‘समानता समितियों’ के गठन को अनिवार्य किया गया था। सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद अब इस मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक बहस और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।
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