आजमगढ़
विधवा बेटी ने 17 साल तक की मां की सेवा, फिर निधन के बाद मुखाग्नि देकर निभाया बेटे का फर्ज |
आजमगढ़।
बदलते समय के साथ की पुरानी पुरम्परायें टूट रही हैं।सनातन धर्म में आमतौर पर किसी भी महिला की मौत के बाद पति या बेटा द्वारा मुखाग्नि देने की परम्परा रही है।कई मामलों में पति और बेटा के नहीं रहने की स्थिति में बेटी द्वारा मुखाग्नि देने का मामला सामने आता रहा है,पर गया में तीन बेटे के रहते हुए एक विधवा बेटी पहले अपनी 94 साल की मौत के बाद पहले शवयात्रा में शामिल हुई और फिर शमशन घाट पर मां के शव को मुखागिन दिया।
मुखाग्नि देने वाली महिला का नाम रीना देवी है जो रौशनगंज थाना के आजमगढ स्थित मध्य विद्यालय में टोला सेवक है।रीना देवी के पति बीएसएफ में जवान थे और बर्ष 2004 में मेघालय में ड्युटी के दौरान ही मलेरिया के शिकार हो गये थे।पति की मौत के बाद से वह अपनी मां स्व चान्दो देवी के साथ ही रह रही थी।तीन भाई और 4 बहन में सबसे ज्यादा मां की सेवा रीना देवी ने ही किया था।इसलिए परिवार के लोगों ने सनातन धर्म के बेटे के द्वारा मुखाग्नि देने की पुरानी परम्परा के बजाय बेटी से ही मुखाग्नि देने का सामुहिक निर्णय लिया गया।

अपनी बहन के द्वारा मुखाग्न दिये जाने के मामले पर कशिश न्युज से बात करते हुए रीना देवी के भाई बालजीत रजक ने कहा कि अपनी परम्परा में बेटी और बेटा के समान अधिकार दिया गया है।सरकार भी बेटी और बेटा के भेद के मिटाने को लेकर लगातार प्रयास कर रही है।इसलिए उनलोगों ने समाहिक रूप से यह निर्णय लिया है।उनकी बहन ने मां के साथ ही पूरे परिवार की सेवा की है।वेलोग चाहतें हैं कि बेटी को बेटा की बराबरी की बात करने के साथ ही धरातल पर भी उसको लालू किया जाना चाहिए।

गौरतलब है कि रौशनगंज का आमजगढ इलाका पूरी तरह से नक्सल प्रभावित है जहां एक समय में नक्सलियों के भय से लौग सामान्य जीवन में भी कई तरहग की परेशानियां झलते रहते थे।केन्द्र और राज्य सरकार के द्वारा एक साथ विका योजना और नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाये जाने से इलाक का माहौल बदला है।अब यहां के लोग अपने मन मिजाज के अऩुसार किसी भी तरह का निर्णय ले रहें हैं और बेटे के रहते बेटी द्वारा मां के शव को मुखाग्नि देना इसी नयी सोच को प्रतिबिम्बित करता है।

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