उत्तर प्रदेश
यूजीसी नियमों पर सियासी विरोधाभास: बृजभूषण शरण सिंह के एक बेटे का समर्थन, दूसरे का खुला विरोध
यूजीसी के नए नियम 2026 पर देशभर में विरोध जारी है। इस बीच बृजभूषण शरण सिंह के एक बेटे का समर्थन और दूसरे का विरोध चर्चा में है।
लखनऊ: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों को लेकर देशभर में जारी विरोध-प्रदर्शनों के बीच एक राजनीतिक और पारिवारिक विरोधाभास सामने आया है। जहां अलग-अलग संगठनों के साथ सर्वण समाज के लोग इन नियमों के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं, वहीं इस आंदोलन में पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह के बेटे और विधायक प्रतीक भूषण सिंह की भी एंट्री हो गई है।
प्रतीक भूषण सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट साझा करते हुए यूजीसी के नए कानून पर सवाल उठाए। उन्होंने लिखा कि इतिहास को देखने के दोहरे मानदंडों पर अब गंभीर विमर्श जरूरी है। उनके मुताबिक, विदेशी आक्रांताओं और उपनिवेशी शक्तियों के अत्याचारों को अतीत की बात कहकर भुला दिया गया, जबकि भारतीय समाज के एक वर्ग को आज भी ऐतिहासिक अपराधी बताकर प्रतिशोध का पात्र बनाया जा रहा है।
हालांकि, इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जिस यूजीसी कानून का प्रतीक भूषण विरोध कर रहे हैं, उसी कानून को तैयार करने वाली टीम में उनके भाई और सांसद करण भूषण सिंह शामिल रहे हैं। इस कारण यूजीसी नियमों को लेकर विरोध केवल सड़कों तक सीमित नहीं, बल्कि एक ही परिवार के भीतर भी अलग-अलग रुख साफ दिखाई दे रहा है।
🎓 यूजीसी नियमों के खिलाफ क्यों उठ रहा है विरोध
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी “उच्च शिक्षा संस्थानों में समता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026” को लेकर देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन हो रहे हैं। इन विनियमों का उद्देश्य वर्ष 2012 के भेदभाव-रोधी ढांचे को हटाकर एक नया नियामक ढांचा लागू करना है, जिसे सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में अनिवार्य किया जाना है।
विरोध कर रहे संगठनों का कहना है कि नए नियमों की भाषा और परिभाषाएं कुछ वर्गों के लिए असमंजस और आशंका पैदा करती हैं। यही वजह है कि सोशल मीडिया से लेकर विश्वविद्यालय परिसरों तक इसका विरोध देखने को मिल रहा है।
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⚖️ सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा मामला, शिक्षा मंत्री का आश्वासन
यूजीसी के हालिया विनियमों को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में एक याचिका भी दाखिल की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि नियमों में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा गैर-समावेशी है और कुछ वर्गों को संस्थागत सुरक्षा के दायरे से बाहर कर दिया गया है।
इस बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पूरे विवाद पर सफाई देते हुए कहा है कि किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा। उन्होंने मंगलवार को राजस्थान के डीडवाना में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा,
“मैं विनम्रतापूर्वक सभी को आश्वस्त करना चाहता हूं कि किसी को भी किसी प्रकार के उत्पीड़न का सामना नहीं करना पड़ेगा। न तो भेदभाव होगा और न ही भेदभाव के नाम पर इस नियम का कोई दुरुपयोग करने दिया जाएगा।”
यूजीसी नियमों को लेकर जारी बहस के बीच सरकार के आश्वासन और विरोधी संगठनों के आंदोलन से आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गरमाने के संकेत दे रहा है।
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